रायपुर।
छत्तीसगढ़ राज्य बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा का बेमेतरा जिले का एक दिवसीय दौरा केवल औपचारिकता नहीं था, बल्कि यह संवेदनशीलता, तत्परता और मानवीय दृष्टिकोण की मिसाल बन गया। उनका यह दौरा कई बच्चों के जीवन में बदलाव की किरण लेकर आया, जो लंबे समय से सामाजिक उपेक्षा और सरकारी योजनाओं से वंचित थे।
डॉ. शर्मा को जानकारी मिली थी कि बेमेतरा के केसडबरी गांव में तीन बच्चे एक दुर्लभ चर्म रोग से पीड़ित हैं। इन मासूमों को जहां एक ओर उनके रोग के कारण समाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ रहा था, वहीं दूसरी ओर वे किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं ले पा रहे थे क्योंकि उनके पास जन्म प्रमाण पत्र तक नहीं था। एक ओर बीमारी की पीड़ा और दूसरी ओर पहचान का संकट – यह बच्चों और उनके परिजनों के लिए दोहरी मार थी।
इस सूचना के बाद डॉ. वर्णिका शर्मा ने खुद केसडबरी गांव का दौरा करने का निर्णय लिया। वहां पहुंचकर उन्होंने केवल औपचारिक निरीक्षण नहीं किया, बल्कि बच्चों के साथ जमीन पर बैठकर उनकी पीड़ा को नज़दीक से महसूस किया। उनकी स्थिति को समझने के बाद डॉ. शर्मा ने अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए कि तीन दिवस के भीतर इन बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र बनवाए जाएं, ताकि उन्हें भी अन्य बच्चों की तरह सरकार की योजनाओं का लाभ मिल सके।
अधिकारियों की तत्परता और संवेदनशीलता के चलते यह कार्य समय पर पूरा हो गया। अब ये बच्चे भी शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं के दायरे में आ गए हैं। यही नहीं, डॉ. शर्मा ने इन बच्चों को एम्स रायपुर में बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए विशेष निर्देश दिए हैं और पूरे मामले को बाल कल्याण समिति की निगरानी में रखने को कहा है। जरूरत पड़ने पर आयोग से सीधा संपर्क बनाए रखने के लिए भी परिजनों को प्रोत्साहित किया गया।
लापता बच्ची की मां को मिला न्याय की आस
बेमेतरा प्रवास के दौरान एक और बेहद संवेदनशील मामला सामने आया, जिसने डॉ. शर्मा के दौरे को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया। एक मां ने अपनी छह माह से लापता बच्ची की व्यथा साझा की। उसकी आंखों में गहरा दर्द और उम्मीद की अंतिम किरण थी। बच्ची की गुमशुदगी की बात सुनते ही डॉ. शर्मा ने तत्काल एफ.आई.आर. दर्ज करने और विशेष अनुसंधान टीम (SIT) गठित करने के निर्देश दिए।
पुलिस प्रशासन ने भी गंभीरता से संज्ञान लिया और अगले ही दिन SIT का गठन कर अन्य राज्य में टीम रवाना की गई। इस तेज़ कार्यवाही से पीड़िता के परिवार को न्याय की नई उम्मीद मिली है और यह संदेश गया है कि बाल अधिकारों को लेकर शासन और आयोग दोनों सजग हैं।
बाल संरक्षण का संवेदनशील चेहरा
डॉ. शर्मा का यह दौरा केवल निर्देशों और बैठकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक बन गया। उनका जमीन पर बैठकर बच्चों से संवाद करना, परिजनों को भरोसा देना और प्रशासन को सख्त निर्देश देना, यह दर्शाता है कि शासन व्यवस्था में संवेदनशीलता और तत्परता दोनों संभव हैं।
आज जब देशभर में बाल शोषण, गुमशुदगी, बीमारी और पहचान से जुड़ी समस्याएं सामने आती हैं, तब ऐसी पहलों से न केवल जागरूकता फैलती है बल्कि यह बच्चों के भविष्य को सुरक्षा और सम्मान भी प्रदान करती है।
निष्कर्ष
डॉ. वर्णिका शर्मा का बेमेतरा दौरा सिर्फ एक प्रशासनिक दौरा नहीं था, बल्कि यह एक प्रेरणादायक पहल थी। इसने दिखाया कि अगर इरादा नेक हो, तो प्रशासनिक सीमाएं भी प्रेम और करुणा के आगे छोटी पड़ जाती हैं। तीन मासूमों को पहचान मिलना और एक मां को न्याय की उम्मीद, यही है असली ‘गवर्नेंस’ का मानवीय चेहरा।
